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माँ, मुझको क्यूँ मारा उसने?

माँ, मुझको क्यूँ मारा उसने?
माँ मुझको तो पढना था...
तुमने और बाबा ने जो थे देखे सपने,
उन सपनो तक बढ़ना था.
माँ जब तक मैं यहाँ जिन्दा था,
इंसा हो के शर्मिंदा था.
यहाँ जीने से तो मौत सही,
अब जिहाद का खौफ नहीं.
माँ वो चंदा जो देखा था,
मुझको उस तक चढ़ना था.
माँ जैसा तुमने सोचा था भविष्य मेरा,
मुझको वैसा गढ़ना था.
माँ आज भी तेरा हाथ थाम के,
जो स्कूल तक आया था.
माँ मुझको जरा भी नहीं पता था,
आज ही मुझको मरना था.
माँ मुझको मरने से पहले,
तेरी बाहों में सोना था...
माँ मौत तो सबको आती है,
क्या मेरे संग ये होना था?

माँ मेरी कहानी ख़त्म हो गयी,
बस इतना ही कहना था,
मेरे दुःख से व्यथित है ‘पाठक’
माँ तुझे मेरे बिन ही रहना था.

-- पेशावर हमले में मारे गए बच्चों को समर्पित

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