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दर्द मुझे भी होता है

मैं भी सिसकी लेता हूँ, और
मेरा दिल भी रोता है,
मर्द हूँ तो क्या हुआ,
इंसान तो हूँ...
दर्द मुझे भी होता है.
बात-बात पर मिलते ताने,
मेरा हाल कोई क्या जाने.
मैं सब की सुनता हूँ, पर
मेरा कोई कब सुनता है.
मर्द हूँ तो क्या हुआ,
इंसान तो हूँ...
दर्द मुझे भी होता है.
जब दर्द हमें न होना था तो,
आंसू ही क्यूँ होते हैं?
जब पाना सब कुछ खुद से है मालिक
तो तेरी मर्ज़ी से क्यूँ खोते है?
कर रहम ‘पाठक’ पर अब,
कितना निश्चिंत तू सोता है,
मर्द हूँ तो क्या हुआ,
इंसान तो हूँ...
दर्द मुझे भी होता है.


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चंद और साँसे बक्श ऐ खुदा

मुझको चंद और साँसे बक्श ऐ खुदा,
सुना है उसे मेरे चाहत का खबर हो चला है.
की तेरे जन्नत की चाह नहीं मुझको,
मुझे उस जमीं पर रख,
जहाँ मेरे यार की खुशबू आती हो...
सुना है उसकी आँखों में अब अक्श मेरा है,
मुझे मेरा अक्श तो दिखा ऐ खुदा,
की आइना देखे भी बरस हो चला है.
नहीं मुझको तेरे बगीचे में खिलना...
मुझे बस मेरे चाहत से है मिलना.
की अब सब्र की इन्तेहां हो गयी,
मुझे थोड़ा सब्र बक्श ऐ खुदा,

की सब्र से ‘पाठक’ बेसबर हो चला है...

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याद

जब कोई चोट तुम्हे पहुंचाता होगा,
कुछ याद तुम्हे भी आता होगा,
सुना है यादों से लगाव तुम्हे है,
कभी मेरे अन्दर तो देख,
जहाँ तेरी यादों को संभाल रखा है.
कुछ लहरें आती-जाती होंगी,
और तेरे मन को भाती होंगी,
सुना है शौक तुझे लहरों का है,
कभी मेरे अन्दर तो देख,
एक पूरा समंदर का उबाल रखा है.
जब खेल गली में चलता होगा,
मन तेरा भी तो मचलता होगा,
सुना है लोगों से खेलना फितरत तेरी है,
आ, फिर मुझसे खेल,
शौक बर्बादी का अब तक पाल रखा है.

------ संजीत कुमार ‘पाठक’


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बदनाम तो हुए

नाम तो अपना तब भी नहीं था,
जब शरीफों में गिनती थी,
अब ‘आशिकी’ पाली है साहिब तो,
कम से कम बदनाम तो हुए.
सुना था बिकती है हर चीज़
यहाँ ग़र कीमत सही हो...
जो बेचा खुद को तो सामान तो हुए.
रखा छुपा कर अब तक पर्दे में ‘पाठक’
बेपर्दा सही कम से कम सरेआम तो हुए.
तनहा रहे तब भी जब भीड़ में थे,
भीड़ से हट कर सही वीरान तो हुए.
नफ़रत रकीबी से लहू में बसी हुई थी,
गले लगा कर रकीबों को,
शौक से लहूलुहान तो हुए.
गिरते रहे, उठते रहे, चलते रहे...
गिर कर, संभल कर आज,
ज़मीं से आसमान तो हुए.


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खोज वफ़ा की

सुना था की की वफ़ा मिलती नहीं
आसानी से अब यहाँ.
सोचा, चलो खोज आते हैं,
शायद मिल जाये कहीं मुझे ही.
आखिर मिल गयी मुहब्बत मुझे,
परी-कथा के किताबों में,
सिमटी-सहमी, सकुचाई सी,
अपने सुनहरे अतीत के साथ,
धुल-धूसरित, पिली पड़ चुके पन्नों में,
हम-बिस्तर हुए...
पूछा मैंने भी,
क्या शर्म नहीं तनिक तुझे भी?
सब बाहर तुझको ढूंढ रहे,
और तुम यहाँ छुपी बैठी हो...
तेरे बिना किसी का आपस में बनता नहीं,
भाई ही भाई का हक़ मार देता है,
दोस्त ही दोस्त के सीने में,
खंजर उतार देता है.
बोली मुहब्बत तुम लोगो ने ही
कुछ ऐसा काम किया है,
गिरते रहे खुद ही,
और मुझको बदनाम किया है...
अफ़सोस मुझे भी है की,
मैं तेरे साथ नहीं.
पर जो भी हुआ है,
उसमे हैरत की बात नहीं.
जैसी तुम सब की आदत है,
एक दिन बहुत पछताओगे...
नफ़रत भी साथ छोड़ जायेगा,
और भावविहीन रह जाओगे.

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तू मेरी और बस मेरी है

तू मेरी और बस मेरी है,
काश ये तुझको जता पाता,
मेरे दो जहाँ तुझसे हैं,
काश ये तुझको बता पाता.
काश तुझे बता पाता की,
कितना प्यार मुझे तुमसे है,
की जिन आँखों में डूबा रहता हूँ,
उनकी गहराई का पता पाता.
फ़िक्र और मेरी बेफिक्री तुमसे है,
काश तुम कभी समझ पाती...
की जब भी हम लड़ा करते थे,
उन सब का प्यार दिखा पाता.
मिलना और बिछड़ना,
ये खेल सभी किस्मत का है.
की बिना मिले भी इक बंधन है,

ये दुनिया को सिखा पाता.

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ऊँची दीवारों वाले

दौलत यहाँ सब कुछ नहीं होती,
सुना है ऊँची दीवारों वाले भी रोते बहुत हैं.
जिंदगी जीने की जद्दोजहद तो देखो,
जिद ने जरूरतों से समझौता कर लिया.
रही शिकायत जिनको अपने एकाकीपन से,
वही यहाँ रिश्तो को ढोते बहुत हैं.
किलकारी बरसो से आँगन में सुना नहीं कोई,
सो कर भी बरसो तक सपना बुना नहीं कोई,
सोचा हाथो की लकीरों से सब कुछ पाने की,
मुट्ठी बंद कर के भी अमीर होते बहुत हैं.
रोने के डर से क्यूँ हँसना ही भूल गए,
उजड़ने के डर से फिर बसना ही भूल गए...
क्या पाया खुद को खो कर जो दुनिया हासिल की?
थोड़ी सी और पाने की चाह में खोते बहुत हैं.
अपनी परछाई से कोई कब भाग सका है...
मर कर एक बार कोई कब जाग सका है...
भागते रहे ‘पाठक’ जो शमशानों से दूर,

कमबख्त यहाँ आ के सोते बहुत हैं.

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