मुझको चंद और साँसे बक्श ऐ
खुदा,
सुना है उसे मेरे चाहत का
खबर हो चला है.
की तेरे जन्नत की चाह नहीं
मुझको,
मुझे उस जमीं पर रख,
जहाँ मेरे यार की खुशबू आती
हो...
सुना है उसकी आँखों में अब
अक्श मेरा है,
मुझे मेरा अक्श तो दिखा ऐ
खुदा,
की आइना देखे भी बरस हो चला
है.
नहीं मुझको तेरे बगीचे में
खिलना...
मुझे बस मेरे चाहत से है
मिलना.
की अब सब्र की इन्तेहां हो
गयी,
मुझे थोड़ा सब्र बक्श ऐ
खुदा,
की सब्र से ‘पाठक’ बेसबर हो
चला है...






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