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माँ, मुझको क्यूँ मारा उसने?

माँ, मुझको क्यूँ मारा उसने?
माँ मुझको तो पढना था...
तुमने और बाबा ने जो थे देखे सपने,
उन सपनो तक बढ़ना था.
माँ जब तक मैं यहाँ जिन्दा था,
इंसा हो के शर्मिंदा था.
यहाँ जीने से तो मौत सही,
अब जिहाद का खौफ नहीं.
माँ वो चंदा जो देखा था,
मुझको उस तक चढ़ना था.
माँ जैसा तुमने सोचा था भविष्य मेरा,
मुझको वैसा गढ़ना था.
माँ आज भी तेरा हाथ थाम के,
जो स्कूल तक आया था.
माँ मुझको जरा भी नहीं पता था,
आज ही मुझको मरना था.
माँ मुझको मरने से पहले,
तेरी बाहों में सोना था...
माँ मौत तो सबको आती है,
क्या मेरे संग ये होना था?

माँ मेरी कहानी ख़त्म हो गयी,
बस इतना ही कहना था,
मेरे दुःख से व्यथित है ‘पाठक’
माँ तुझे मेरे बिन ही रहना था.

-- पेशावर हमले में मारे गए बच्चों को समर्पित

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वो मुस्कुराता रहा...

वक़्त फिसल गया मुट्ठी से,
वो दूर मुझसे जाता रहा.
काश! रोक पाता उसे,
मैं रोता रहा, वो मुस्कुराता रहा...
मैं जीता रहा बस उसके लिए,
और वो मुझे आजमाता रहा.
गुजर गयी उम्र रूठने-मनाने में,
वो रूठता रहा, मैं मनाता रहा.
मेरी मासूमियत का सबब ये रहा,
वो जला कर मुझे अपनी ठण्ड मिटाता रहा.
‘आशिक’ हूँ, जलना तो यूँ भी है,
जल कर भी ‘पाठक’ गुनगुनाता रहा...
कल भी तेरा था, कल भी तेरा हूँ,

बस वक़्त आता-जाता रहा.

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खुद से ही अब लड़ना होगा

तुझको खोने से डरता था,
अब तेरे बिन ही रहना होगा...
पहले लड़ता था दुनिया से,
खुद से ही अब लड़ना होगा.
तुझे ख़ुशी देने की खातिर,
पल-पल मुझको मरना होगा.
तेरे चहक वापस लाने को,
आहें मुझको भरना होगा.
पहले लड़ता था दुनिया से,
खुद से ही अब लड़ना होगा.
तेरी एक ख़ुशी के लिए चाहे,
जो भी मुझको करना होगा.
पहले लड़ता था दुनिया से,

खुद से ही अब लड़ना होगा.

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जातिगत आरक्षण : कितना सही...

साल 2014 राजनीती के सापेक्ष दो चीजों के लिए हमेशा याद किया जाता रहेगा. पहला तो अब तक का सबसे बड़ा सत्ता परिवर्तन के लिए और दूसरा, राजनेताओ के फिसलते जुबान के लिए. अब जब साल अपने  आखिरी पड़ाव पर है, श्री जीतन राम मांझी दलितों के लिए 80% आरक्षण की वकालत कर एक बार फिर से सुर्ख़ियों में बने हुए हैं.
       “India is the most racist country in the world!” ये एक ऐसी सच्चाई है जिसे गाहे-बगाहे हम सबने इंकार किया है लेकिन हम सबने कहीं-न-कहीं इसे महसूस भी किया है, इससे इंकार नहीं कर सकते. श्री मांझी का नवीनतम बयान इसका ताजा उदाहरण है. बात चाहे नौकरी की हो, शिक्षण संस्थानों में प्रवेश की हो, आदिवासी बहुल क्षेत्र में मुखिया, सरपंच या विधायक की हो... हर जगह आरक्षण का प्रावधान है. लेकिन क्या कभी हमने ये भी सोचा है की ‘most racist’ का तमगा हमें मिला कैसे? चलिए आपको एक छोटी सी घटना बताता हूँ.
       बात अप्रैल 2008 की है. अविभाजित बिहार की. उन दिनों सरकारी विद्यालयों में पुस्तक भी सुलभता से हासिल नहीं हो पाते थे. पुस्तक, साईकिल, छात्रवृति सब जातिगत निचले तबके के छात्रों को ही मिलता था. तब वह बच्चा तीसरे कक्षा का छात्र था तक़रीबन 8 साल का, संभवतः अपने कक्षा का एक मात्र सामान्य श्रेणी का लड़का. जाहिर है, उसके अलावा बाकि सबके लिए गिनती से किताबें आई थी. उसी कक्षा में भाई-बहन का एक जोड़ा भी था. जिस दिन किताब बांटना था, उस दिन बहन विद्यालय नहीं आई थी, उसके हिस्से का किताबों के एक सेट बच गया था जो सामान्य श्रेणी के उस छात्र को दे दिया गया. अगले दिन दोनों ही स्कूल आये. और उस फिर उस छात्र से पुस्तक ये कहते हुए वापिस लिया गया की ये तुम्हारी नहीं है. सामान्य श्रेणी के छात्रों के लिए पुस्तकें नहीं आती. क्या आप उसके मानसिक स्थिति का अंदाज़ा भी लगा सकते हैं? पता है वो बच्चा कौन था? वो मैं था. या यूँ कहें ऐसे अनगिनत बच्चे रहे होंगे, जिन्होंने इस तरह की स्थिति का सामना किया होगा. क्या आप उनसे जातिगत असंवेदनशील होने की अपेक्षा रख सकते हैं?
       माने या ना माने, सच्चाई ये है की यहाँ पूरा सिस्टम ही जातिवाद का संवाहक है. बचपन से ही एक उच्च जाति के बच्चे को निम्न जाति वालों से अलग रहना सिखाया जाता है. इसकी शुरुआत घर से ही हो जाती है. रही-सही कसर स्कूल भी पूरा कर ही लेता है. और जो थोड़ी सी रह गयी, उसका श्रेय श्री मांझी सरीखे राजनेताओ को जाता है. जो आभासी सहानुभूति के लिए समाज में जातिवाद के बीज बोते हैं. इनके लिए मैं इतना ही कह सकता हूँ, ‘तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार’ का इतिहास देख लीजिये... आपको सहसा ही अंदाज़ा हो जायेगा की आप किसी दिशा में हैं. शुक्र है आज गाँधी जी नहीं रहे. अगर उस समय भी उन्हें तनिक भी भान रहा होता की भारतवर्ष का राजनैतिक विरासत आगे कौन सँभालने वाले हैं तो उनकी हत्या का कलंक गोडसे के सर न लगता.
       एक उदाहरण, कमोबेश हर राज्य में MBBS में प्रवेश के लिए सामान्य श्रेणी के छात्रों के लिए बारहवीं में 55-60% अनिवार्य है. वहीँ आरक्षित सीटों के लिए 45-50%. दोनों ही डॉक्टर बनेंगे. क्या आप दोनों के बराबर होने की अपेक्षा कर सकते हैं? (शायद प्रायोगिक तौर पर हो, लेकिन तार्किक तौर पर नहीं). इस तरीके से आप मात्रा (Quantity) बढ़ा सकते हैं, गुणवत्ता (Quality) नहीं.
       अंत में, अपने आप को सैकड़ों बार दलित शब्द से कृतार्थ करने वाले श्री मांझी जाति से दलित नहीं है. वे सोच से दलित हैं. आशा है वो आने वाले समय में ‘सामान्य’ सोच विकसित कर सकेंगे!!!


इस लेख से मेरा किसी के भावनाओ को ठेस पहुचने का कोई इरादा नहीं. विचार मेरे व्यक्तिगत हैं एवं मैं जातिगत आरक्षण के जगह आय आधारित एवं विकलांग लोगों के लिए आरक्षण का कट्टर पक्षधर हूँ.

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चलो सरकार बनाते हैं

बीत गया इलेक्शन सीजन,
फिर से हाहाकार मचाते हैं,
अर्जुन, बाबु, शिबू आओ,
फिर से सरकार बनाते हैं.

आश्वासन का थैला समेटो,
उन सबका अब काम नहीं,
जो वादे किये थे जनता से
अब उनका अचार बनाते हैं.
अर्जुन, बाबु, शिबू आओ,
फिर से सरकार बनाते हैं.

हम भी लूटें, तुम भी लूटो,
दिन को लूटें, रात को लूटो.
इलेक्शन में साला खर्च बहुत हुआ.
अब दो का चार बनाते हैं.
अर्जुन, बाबु, शिबू आओ,
फिर से सरकार बनाते हैं.

बेचा कोयला, बालू बेचा.
बेचा जमीन, ज़मीर भी बेचा.
अब झारखण्डसे खंडबेच कर,
इसको झार बनाते हैं.
अर्जुन, बाबु, शिबू आओ,
फिर से सरकार बनाते हैं.

नया गवर्नमेंट काम बहुत है,
साली राजनीति में नाम बहुत है.
जो अपनी रोटी कमा-खा रहे,
उनको बेरोजगार बनाते हैं.
अर्जुन, बाबु, शिबू आओ,
फिर से सरकार बनाते हैं.

पहले से ही बीमार झारखण्ड,
इसको और बीमार बनाते हैं,
अर्जुन, बाबु, शिबू आओ,
फिर से सरकार बनाते हैं.

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