मैं भी सिसकी लेता हूँ, और
मेरा दिल भी रोता है,
मर्द हूँ तो क्या हुआ,
इंसान तो हूँ...
दर्द मुझे भी होता है.
बात-बात पर मिलते ताने,
मेरा हाल कोई क्या जाने.
मैं सब की सुनता हूँ, पर
मेरा कोई कब सुनता है.
मर्द हूँ तो क्या हुआ,
इंसान तो हूँ...
दर्द मुझे भी होता है.
जब दर्द हमें न होना था तो,
आंसू ही क्यूँ होते हैं?
जब पाना सब कुछ खुद से है मालिक
तो तेरी मर्ज़ी से क्यूँ खोते है?
कर रहम ‘पाठक’ पर अब,
कितना निश्चिंत तू सोता है,
मर्द हूँ तो क्या हुआ,
इंसान तो हूँ...
दर्द मुझे भी होता है.





