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हवस और नारी

कितना बदल गया है भारत,
हवस रोटी पर भारी है,
जहाँ पूजी जाती थी पहले,
अब हर पल लुटती नारी है.

जो कभी थी लक्ष्मी बाई,
आज खुद बेचारी है.
अपने आबरू की भीख मांगती,
ये कैसी लाचारी है?

पहले था धृतराष्ट्र नयनसुख,
अब क़ानून ही अँधा है.
द्रौपदी हारी थी एक जुए मे,
अब हर नज़रों से हारी है.

हर मोड़ पर लूटने वाली,
बेटी बहन किसी की है.
अरे ! नोच रहे हो किसको ?
देखो, शायद बहन तुम्हारी है.

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