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कर लेते हैं कुछ बात प्रिये

अनचाहे जब मिल ही गए हैं,
कर लेते हैं कुछ बात प्रिये.
अपना हाल सुनाओ तुम,
यहाँ बद-से-बदतर हालात प्रिये.
कैसे तेरे दिन कटते हैं,
कैसे कटती है रात प्रिये?
मैं तो पल-पल मरता हूँ,
कैसे तेरे लम्हात प्रिये?
तेरा बोर्ड जाल भी तेरे
तेरे मोहरे चाल भी तेरे
मैं भूल गया औकात प्रिये.
चलो खेलें फिर खेल वही,
शह तेरा मेरी मात प्रिये,
सुना है बाज़ारों में बिकते हैं, अब
किलो के दर जज़्बात प्रिये.


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चल आज कुछ मोहब्बत सा खेलते हैं

चल आज कुछ मोहब्बत सा खेलते हैं

मैं हर बार तुझ पर जान दूंगा,
तू हर बार मुझको मौत देना.

मैं हर बार तुझे खुशियाँ दूंगा,
तू हर बार मुझे जिल्लत देना.

मैं हर सुबह तुझे रौशनी दूंगा,
हर शाम तू मुझे अँधेरा देना.

मैं हर बार तुझे हकीकत दूंगा,
हर बार तू मुझे बहाना देना.

चल आज कुछ मोहब्बत सा खेलते है </3 http://m-static.ak.fbcdn.net/rsrc.php/v2/ya/r/XVs6rhX0HCD.png

मैं हर बार तुझे आजादी दूंगा,
हर बार तू मुझे घुटन देना.

हर बार मैं तुझे जन्नत दूंगा,
हर बार तू मुझे क़यामत देना.

मैं हर बार तुझ पर भरोसा करूँगा,
और तू हर बार उसे तोडती जाना.

फिर हर बार पूछना दिया क्या तुमने?
और मैं हर बार कहूँगा, कुछ नहीं!!.....
पर मुझे तुझसे सब कुछ मिला http://m-static.ak.fbcdn.net/rsrc.php/v2/ya/r/Ob2Er7b1NpV.png 

वो सब.. जो एक आशिक को मिलता है,
थोड़ी सी दर्द, थोडा सा आंसू और अगणित इंतजार.

हर पल शिकायत करना मेरी बेरुखी का,
और पल मुझे बेबसी देना.

चल आज कुछ मोहब्बत सा खेलते हैं http://m-static.ak.fbcdn.net/rsrc.php/v2/y0/r/A-la0dkt8j5.png

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हवस और नारी

कितना बदल गया है भारत,
हवस रोटी पर भारी है,
जहाँ पूजी जाती थी पहले,
अब हर पल लुटती नारी है.

जो कभी थी लक्ष्मी बाई,
आज खुद बेचारी है.
अपने आबरू की भीख मांगती,
ये कैसी लाचारी है?

पहले था धृतराष्ट्र नयनसुख,
अब क़ानून ही अँधा है.
द्रौपदी हारी थी एक जुए मे,
अब हर नज़रों से हारी है.

हर मोड़ पर लूटने वाली,
बेटी बहन किसी की है.
अरे ! नोच रहे हो किसको ?
देखो, शायद बहन तुम्हारी है.

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छठ: सामाजिक एवं वैज्ञानिक महत्व का महापर्व

और फिर से एक बार छठ महापर्व आ चूका है. छठ, एक त्यौहार जो आध्यात्मिक महत्त्व के साथ-साथ वैज्ञानिक महत्त्व भी रखता है. यूँ तो चार दिनों वाले इस त्यौहार की शुरुआत कल से ही हो चूकी है. आज इस महापर्व का दूसरा दिन है, जिसे “खरना” के नाम से जाना जाता है. ऐसे तो छठ त्यौहार है सूर्य उपासना का, लेकिन इसका सामाजिक महत्त्व भी है.
छठ, वैज्ञानिक महत्त्व : सूर्य पृथ्वी पर उर्जा का सबसे बड़ा श्रोत है. पूरे सौर मंडल सूर्य से ही संचालित होते है और इस तरह छठ उस असीम उर्जा के श्रोत के लिए आभार प्रकट करने का एक दिन है. प्रातः काल एवं संध्या के समय सूर्य नमन का मानव शरीर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. और सबसे बड़ी बात, छठ में कमर तक जल में खड़े होकर जो अर्घ्य प्रदान किया जाता है, उससे कटि स्नान होता है, जिसे आयुर्वेद में प्रधानता दी गयी है. कटि स्नान कई रोगों का नाशक है.
छठ, सामाजिक महत्त्व : यूँ तो पूरे साल हर व्यक्ति अपने काम में व्यस्त रहता है. “खरना” के दिन दूसरों के घर जा कर प्रसाद लेना सामाजिकता को बढ़ावा देता है. जिनके घर में छठ का त्यौहार नहीं होता, वे दुसरो को इसमें मदद करते हैं. नदियों, तालाबो, जलाशयों की सफाई की जाती है और छठ के घाट पर एक दुसरे से मिलना सामाजिक सद्भाव को बढाता है.
छठ, पौराणिक महत्त्व : यूँ तो छठ का बखान रामायण से लेकर महाभारत में भी मिलता है, लेकिन इसका बखान ऋन्गवेद में भी मिलता है. ऐसी मान्यता है की एक बार महर्षि अर्क को कुष्ठ हो गया था. अति विचलित वो अपने जीवन का त्याग करने को आतुर थे तभी आकाशवाणी हुई की छठी मैया के व्रत को करो, तुम्हारा कल्याण होगा. जिसके बाद महर्षि अर्क ने पूरे विधान के साथ छठ व्रत को किया और कुष्ठ से मुक्त हुए.

छठ, भारतीय संस्कृति का वाहक : भारतीय संस्कृति में नारी को प्रधानता दी गयी है. यहाँ लक्ष्मी, दुर्गा, सरस्वती पूजित है तो रानी लक्ष्मी बाई जैसी वीरांगनाएं भी. छठ इस संस्कृति का वाहक भी है. अब आप सोच रहे होंगे जब सूर्य देव हैं तो नारी पूजन कैसे? असल में छठ में छठी मैया की पूजा की जाती है, अर्थात सूर्य के नारी की. इसके पीछे एक किवदंती है. एक बार भगवन परशुराम की माता रेणुका अपने आँगन में तुलसी पूजन कर रही थी. उस वक़्त सूर्य देव प्रचंड ताप पर थे. रेणुका पसीने से लथ-पथ पूजन कर रही थी. परशुराम के पिता जमदग्नि ऋषि ने जब देखा तो क्रोधातुर हो कर सूर्य को नारी बनने का शाप डे दिया. सूर्य के क्षमा मांगने के बाद क्षमा करते हुए उन्होंने कहा : “शाप कभी निष्फल नहीं जाता. अतः अब से साल के एक दिन सूर्य की नारी रूप में पूजा होगी.”. और तब से छठ में सूर्य के नारी रूप का पूजन होता है. इसके पीछे दूसरा कारण यह है की छठ शब्द संस्कृत के षष्ठी शब्द से लिया गया है, जो की स्त्रीलिंग है. इसीलिए भी छठी मैया कहा जाता है और स्त्री रूप की पूजा की जाती है. 

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कश्ती

कश्ती तब भी चलते थे, कश्ती अब भी चलते हैं,
तब कागज के चलते थे, अब सपनो के चलते हैं।
शिकवे तब भी होते थे, शिकवे अब भी होते हैं,
तब गैरों के होते थे, अब अपनों के होते हैं।

खेल तब भी होते थे, खेल अब भी होते है,
तब चाले थी अपनी, अब मोहरे हमें ही चलते हैं .
कुछ बचपन तब भी थी, कुछ बचपन अब भी है,
तब शरारत में होते थे, अब शराफ़त में होते हैं .

दिन तब भी होते थे, दिन अब भी होते हैं,
तब धूप सुहानी थी, अब छाव भी जलते हैं,
रोते तब भी थे, जब माँ छिप जाती थी,
रोते अब भी है, माँ से हीं छिप-छिप कर।

तब चन्दा मामा था, अब उसपे भी नमी सी है,
तब हर लम्हा अपना था, अब वक़्त की कमी सी है .
तब छुपते से खेल-खेल में, अब ये मजबूरी है,
जो मुट्ठी में थी खुशियाँ, अब उनसे भी दूरी है।


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